JTET परीक्षा से क्षेत्रीय भाषाओं को हटाने पर मचा बवाल; आलोक चौरसिया और केएन त्रिपाठी ने सरकार को घेरा

मेदिनीनगर/पलामू: झारखंड शिक्षक पात्रता परीक्षा (JTET) में क्षेत्रीय भाषाओं की सूची से भोजपुरी, मगही, अंगिका और मैथिली को हटाए जाने के सरकार के फैसले ने राज्य में एक नया राजनीतिक विवाद खड़ा कर दिया है। पलामू प्रमंडल के दो दिग्गज नेताओं—डाल्टनगंज विधायक आलोक चौरसिया और पूर्व मंत्री केएन त्रिपाठी—ने इस मुद्दे पर कड़ा विरोध जताते हुए इसे युवाओं के भविष्य के साथ खिलवाड़ बताया है।

सरकार युवाओं की आवाज दबाना बंद करे: आलोक चौरसिया

डाल्टनगंज विधायक आलोक चौरसिया ने सोशल मीडिया के माध्यम से हेमंत सोरेन सरकार पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि पलामू के बच्चों के भविष्य के साथ यह खिलवाड़ बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।

आलोक चौरसिया के मुख्य बिंदु:

• JTET परीक्षा से भोजपुरी, मगही, अंगिका और मैथिली को हटाना झारखंड के करोड़ों युवाओं के भविष्य से खेलने जैसा है।
• यह कदम युवाओं की आवाज दबाने और उनका गला घोंटने जैसा है।
उन्होंने सरकार से मांग की है कि इस फैसले में जल्द से जल्द सुधार किया जाए, अन्यथा उग्र विरोध किया जाएगा।

2022 के आंदोलन के बाद मिली जीत को सरकार ने फिर छीना: केएन त्रिपाठी

पूर्व मंत्री और वरिष्ठ नेता केएन त्रिपाठी ने भी इस मुद्दे पर नाराजगी जाहिर करते हुए सरकार को पुरानी याद दिलाई। उन्होंने कहा कि पिछली बार भी भारी विरोध के बाद इन भाषाओं को शामिल किया गया था, जिसे अब फिर से हटा दिया गया है।

केएन त्रिपाठी के मुख्य बिंदु:

• सरकार ने एक बार फिर पलामू, गढ़वा और लातेहार से भोजपुरी-मगही और संताल परगना से अंगिका-मैथली को हटा दिया है।
• वर्ष 2022 में बड़े आंदोलन के बाद इन भाषाओं को इन जिलों की क्षेत्रीय सूची में जोड़ा गया था।
• उन्होंने सरकार से अविलंब संशोधन करने और इन भाषाओं को पुनः लागू करने की मांग की है।

क्या है पूरा विवाद?

हाल ही में जारी JTET की नियमावली में पलामू संभाग और संताल परगना के कुछ जिलों से उन भाषाओं को हटा दिया गया है जो वहां के बड़े वर्ग द्वारा बोली जाती हैं। छात्रों और नेताओं का तर्क है कि इससे स्थानीय अभ्यर्थियों को परीक्षा में नुकसान होगा और यह उनके भाषाई अधिकारों का हनन है।

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