झारखंड शिक्षक पात्रता परीक्षा (JTET) की नई नियमावली को लेकर राज्य की राजनीति में एक नया मोड़ आ गया है। बुधवार को हुई कैबिनेट की अहम बैठक में मंत्रियों के कड़े विरोध के बाद फिलहाल इस नियमावली को मंजूरी नहीं मिल सकी है और इस पर फैसला टाल दिया गया है। मुख्य विवाद भोजपुरी, मगही और अंगिका जैसी भाषाओं को क्षेत्रीय भाषा की सूची से बाहर रखने के कारण उत्पन्न हुआ था, जिसके चलते पलामू प्रमंडल सहित राज्य के कई हिस्सों में भारी असंतोष देखा जा रहा था। कैबिनेट में वित्त मंत्री राधा कृष्ण किशोर और ग्रामीण विकास मंत्री दीपिका पांडे सिंह ने नियमावली के वर्तमान स्वरूप पर कड़ी आपत्ति जताते हुए मांग की कि पलामू प्रमंडल में इन भाषाओं को अनिवार्य रूप से शामिल किया जाए। सरकार ने मंत्रियों के इस रुख को देखते हुए फिलहाल कदम पीछे खींच लिए हैं और अब इस पूरे मामले पर नए सिरे से विचार किया जाएगा।
इस फैसले के बाद राज्य में राजनीतिक श्रेय लेने की होड़ भी शुरू हो गई है। पूर्व मंत्री और झामुमो के केंद्रीय महासचिव मिथिलेश ठाकुर ने इसे सोशल मीडिया पर साझा करते हुए इसे राज्य के छात्रों की जीत बताया और कहा कि नियमावली रद्द होने से गढ़वा-पलामू के युवाओं को अब अनुचित भेदभाव का सामना नहीं करना पड़ेगा। दूसरी ओर, भाजपा प्रदेश उपाध्यक्ष और पूर्व मंत्री भानु प्रताप शाही ने भी इसे युवाओं की हुंकार का परिणाम करार दिया है। शाही के अनुसार, यह पलामू के 50 लाख भोजपुरी और मगही भाषियों की बड़ी जीत है। गौरतलब है कि भाजपा विधायक सत्येंद्र नाथ तिवारी और भानु प्रताप शाही ने इस मुद्दे पर सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल रखा था और क्षेत्रीय भावनाओं की अनदेखी करने पर कड़े आंदोलन की चेतावनी भी दी थी।
स्कूली शिक्षा विभाग की प्रस्तावित नियमावली में जिलावार जनजातीय और क्षेत्रीय भाषाओं के चयन का प्रावधान था, जिसमें भोजपुरी और मगही को जगह नहीं दी गई थी। इस फैसले से पलामू प्रमंडल के युवाओं में गहरा रोष था और वे खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहे थे। अब जबकि सरकार ने इस विवादित फैसले पर रोक लगा दी है, तो इसे स्थानीय युवाओं और राजनीतिक दबाव की एक बड़ी सफलता के रूप में देखा जा रहा है। सरकार अब नए सिरे से क्षेत्रीय संतुलन और भाषाई संवेदनशीलता को ध्यान में रखकर नई नीति तैयार करने की दिशा में काम करेगी, ताकि भविष्य में होने वाली नियुक्तियों में किसी भी क्षेत्र के अभ्यर्थियों के साथ अन्याय न हो।
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