झारखंड में डायन प्रथा जैसी कुप्रथाओं को रोकने के लिए कानून


झारखंड में डायन प्रथा जैसी कुप्रथाओं को रोकने के लिए कानून बहुत सख्त हैं। इस मामले में पुलिस ने जो प्राथमिकी (FIR) दर्ज की है, उसके तहत आरोपियों पर न केवल भारतीय दंड संहिता (IPC) या अब नए न्याय संहिता की धाराएं लगेंगी, बल्कि झारखंड का विशेष कानून भी लागू होगा।

यहाँ इस मामले से संबंधित प्रमुख कानूनी जानकारी दी गई है:

झारखंड डायन प्रथा प्रतिषेध अधिनियम, 2001

झारखंड सरकार ने इस सामाजिक बुराई को खत्म करने के लिए विशेष रूप से यह कानून बनाया है। इसके तहत निम्नलिखित सजा के प्रावधान हैं:
• डायन की पहचान करना: अगर कोई व्यक्ति किसी को 'डायन' या 'ओझा' के रूप में पहचानता है या घोषित करता है, तो उसे 3 महीने तक की जेल या 1000 रुपये जुर्माना (या दोनों) हो सकता है।
• प्रताड़ित करना: डायन के नाम पर किसी को शारीरिक या मानसिक रूप से प्रताड़ित करने पर 6 महीने तक की जेल और 2000 रुपये तक का जुर्माना हो सकता है।
• मैला पिलाना या अमानवीय कृत्य: इस मामले में जैसा कि वृद्ध को मैला पिलाया गया है, यह गंभीर अपराध की श्रेणी में आता है। इसके लिए 1 साल तक की सख्त कैद और भारी जुर्माने का प्रावधान है।

भारतीय कानून की अन्य महत्वपूर्ण धाराएं

चूँकि यह मामला शारीरिक शोषण और अपमान से जुड़ा है, इसलिए पुलिस इसमें निम्नलिखित धाराएं भी जोड़ती है:
• धारा 323/341: स्वेच्छा से चोट पहुँचाने और गलत तरीके से रोकने के लिए।
• धारा 354/355: किसी व्यक्ति का अपमान करने के उद्देश्य से उस पर हमला करना या आपराधिक बल का प्रयोग करना।
• धारा 504/506: शांति भंग करने के इरादे से जानबूझकर अपमान करना और आपराधिक धमकी देना।
• धारा 147/149 (दंगा): जब एक समूह (जैसे इस मामले में 21 लोग) मिलकर किसी अपराध को अंजाम देता है, तो सामूहिक जिम्मेदारी की ये धाराएं लगाई जाती हैं।

विशेष नोट: झारखंड पुलिस ने इस मामले में जीरो टॉलरेंस की नीति अपनाई है। नेतरहाट जैसे इलाकों में जागरूकता की कमी के कारण अक्सर लोग 'सड़क दुर्घटना' या 'बीमारी' का दोष जादू-टोने पर मढ़ देते हैं, जिसे कानून पूरी तरह से अंधविश्वास मानता है।

Post a Comment

और नया पुराने