रांची: झारखंड हाईकोर्ट ने भूमि विवाद के एक मामले में महत्वपूर्ण निर्णय सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि 'रिकॉर्ड ऑफ राइट्स' (खतियान) के अंतिम प्रकाशन के बाद, निर्धारित समय सीमा बीत जाने पर दायर किए गए मुकदमे कानूनी रूप से मान्य नहीं होंगे। जस्टिस एस.के. द्विवेदी की अदालत ने इस मामले में निचली अदालत के पुराने आदेश को रद्द कर दिया है।
क्या है पूरा मामला?
यह विवाद दुमका जिले के बारा करेला और गजांडा गांवों की जमीन से जुड़ा है।
* याचिकाकर्ता केदार बैद की माता के नाम पर जमीन का 'रिकॉर्ड ऑफ राइट्स' वर्ष 1998 में अंतिम रूप से प्रकाशित हुआ था।
* इसके बावजूद, प्रतिवादी लोबिन मांझी एवं अन्य ने वर्ष 2006 में 'टाइटल सूट' दाखिल कर जमीन पर अधिकार और कब्जे की मांग की।
* दुमका की सब-जज अदालत ने इस वाद को खारिज करने से इनकार कर दिया था, जिसे अब हाईकोर्ट ने गलत ठहराते हुए रद्द कर दिया है।
6 महीने की समय सीमा अनिवार्य
अदालत ने अपने फैसले में संताल परगना बंदोबस्त विनियमन, 1872 के प्रावधानों का हवाला दिया। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि:
* खतियान के खिलाफ कोई भी आपत्ति इसके प्रकाशन के छह महीने के भीतर ही दर्ज की जा सकती है।
* इस अवधि के बाद खतियान अंतिम रूप ले लेता है।
* बिना नई बंदोबस्त प्रक्रिया या राज्य सरकार की स्पष्ट अनुमति के इसे चुनौती देना कानूनन वर्जित है।
कोर्ट की टिप्पणी
अदालत ने पाया कि प्रतिवादियों ने न तो निर्धारित 6 महीने में आपत्ति जताई और न ही 1998 के प्रकाशन को समय पर चुनौती दी। ऐसे में 2006 में दाखिल किया गया यह वाद समय-सीमा से बाहर (Time-barred) है और कानूनी रूप से टिकने योग्य नहीं है।
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