पलामू। झारखंड की राजनीति में भाषाई पहचान का मुद्दा एक बार फिर गरमा गया है। वरिष्ठ नेता भानु प्रताप शाही ने पलामू प्रमंडल के कद्दावर नेताओं के खिलाफ मोर्चा खोलते हुए एक तीखा हमला बोला है। उन्होंने सोशल मीडिया के माध्यम से स्थानीय मंत्रियों और विधायकों को सीधे तौर पर चुनौती देते हुए कहा है कि यदि वे मगही और भोजपुरी भाषा को सरकार की आधिकारिक नीतियों और क्षेत्रीय प्राथमिकताओं में सम्मानजनक स्थान नहीं दिला सकते, तो उन्हें अपने पदों पर बने रहने का कोई नैतिक अधिकार नहीं है। शाही ने "संघर्ष जारी रखो दोस्तों" का नारा देते हुए समर्थकों में जोश भरा और स्पष्ट किया कि इतिहास हमेशा लड़ने वालों का लिखा जाता है, न कि डरने वालों का।
भानु प्रताप शाही ने अपने निशाने पर पलामू के मंत्री राधा कृष्ण किशोर, विधायक संजय यादव, नरेश सिंह और अनंत प्रताप देव जैसे दिग्गज नेताओं को लिया है। उन्होंने दोटूक शब्दों में कहा कि या तो ये जन-प्रतिनिधि अपनी वर्तमान सरकार से मगही और भोजपुरी को आधिकारिक तौर पर जुड़वाएं या फिर जनभावनाओं का सम्मान करते हुए तत्काल प्रभाव से इस्तीफा दे दें। उनका यह रुख पलामू और गढ़वा क्षेत्र में भाषाई अस्मिता को लेकर चल रहे लंबे विवाद को नई दिशा दे रहा है। शाही के इस बयान से सत्ता पक्ष के भीतर खलबली मच गई है और इसे आगामी राजनीतिक समीकरणों के लिहाज से काफी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
इस भाषाई आंदोलन को धार देते हुए भानु प्रताप शाही ने बीजेपी झारखंड के शीर्ष नेतृत्व सहित बाबूलाल मरांडी और आदित्य साहू जैसे नेताओं को भी टैग किया है, जिससे यह साफ संकेत मिलता है कि वे इस मुद्दे को राज्य स्तर पर एक बड़े विमर्श में बदलना चाहते हैं। क्षेत्र के लोगों के बीच मगही और भोजपुरी के प्रति गहरा लगाव है, और इसे सरकारी मान्यता न मिलना लंबे समय से एक टीस बना हुआ है। अब देखना यह होगा कि भानु प्रताप शाही की इस सीधी चेतावनी के बाद पलामू के मंत्री और विधायक इस पर क्या प्रतिक्रिया देते हैं और सरकार इस दबाव के बीच क्या रुख अपनाती है।
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