गढ़वा के विधायक और वरिष्ठ भाजपा नेता सत्येंद्र नाथ तिवारी ने झारखंड की पहचान और स्थानीय अस्तित्व को लेकर एक बड़ा मोर्चा खोल दिया है। उन्होंने हाल ही में राजभवन पहुँचकर राज्यपाल संतोष गंगवार से मुलाकात की और गढ़वा, पलामू तथा लातेहार जिलों की उन ज्वलंत समस्याओं को प्रमुखता से साझा किया जो लंबे समय से अनसुनी रही हैं। विधायक तिवारी ने स्पष्ट किया कि जब बात अपनी मिट्टी और भविष्य की सुरक्षा की हो, तो चुप रहना संभव नहीं है। उन्होंने इस मुलाकात के दौरान विशेष रूप से क्षेत्रीय भाषाओं की उपेक्षा और मंडल डैम के कारण उत्पन्न हुए विस्थापन के गंभीर संकट पर राज्यपाल का ध्यान आकृष्ट कराया।
विधायक सत्येंद्र नाथ तिवारी ने क्षेत्रीय अस्मिता का मुद्दा उठाते हुए कहा कि गढ़वा, पलामू और लातेहार की आत्मा मुख्य रूप से भोजपुरी, मगही और हिंदी भाषा में बसती है। ये भाषाएँ केवल संवाद का माध्यम नहीं हैं, बल्कि यहाँ के बच्चों की सोच, संस्कृति और उनके सपनों का आधार हैं। उन्होंने हेमंत सरकार पर कड़ा प्रहार करते हुए आरोप लगाया कि शिक्षक पात्रता परीक्षा (JTET) से इन भाषाओं को बाहर करना युवाओं के साथ घोर अन्याय है। यह निर्णय केवल भाषाई भेदभाव नहीं है, बल्कि उन हजारों युवाओं के रोजगार और भविष्य पर एक बड़ा सवालिया निशान है जो अपनी मातृभाषा में शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं।
भूमि और आजीविका के संकट पर चिंता जताते हुए विधायक ने मंडल डैम से प्रभावित परिवारों की स्थिति को बेहद संवेदनशील बताया। उन्होंने राज्यपाल को अवगत कराया कि गढ़वा के रंका प्रखंड में करीब 780 विस्थापित परिवारों को 1000 एकड़ जंगल क्षेत्र में बसाने की तैयारी की जा रही है, जो कि पूरी तरह से स्थानीय ग्राम सभा और निवासियों की सहमति के बिना हो रहा है। यह वह जंगल है जहाँ से लोग महुआ चुनकर, बीड़ी पत्ता तोड़कर और जड़ी-बूटियों के जरिए अपना स्वरोजगार चलाते हैं। आज स्थिति यह है कि जंगल छिनने के कगार पर है और स्थानीय लोग अपने ही हक के लिए दर-दर भटकने को मजबूर हैं।
अधिकारों की इस जंग में पुलिसिया कार्रवाई और प्रशासनिक दबाव का मुद्दा भी जोर-शोर से उठा। विधायक ने 8 दिसंबर की घटना का उल्लेख करते हुए बताया कि जब ग्रामीणों ने अपने हक के लिए शांतिपूर्ण विरोध किया, तो पुलिस की बर्बरता का शिकार महिलाओं को भी होना पड़ा। आज करीब 20 गांवों में दहशत का माहौल है और ग्रामीण डर के साये में जीने को विवश हैं। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि विस्थापितों को सामान्य पंचायत क्षेत्रों में बसाने से पेसा (PESA) एक्ट के तहत मिलने वाले उनके अधिकार भी प्रभावित होंगे, जिससे विस्थापित और स्थानीय निवासी दोनों के जमीन और रोजगार पर संकट खड़ा हो जाएगा।
राज्यपाल संतोष गंगवार से हुई इस महत्वपूर्ण चर्चा में सत्येंद्र नाथ तिवारी ने दो प्रमुख माँगें रखीं। पहली माँग यह है कि JTET परीक्षा में तत्काल प्रभाव से भोजपुरी, मगही और हिंदी को शामिल किया जाए ताकि स्थानीय युवाओं के साथ न्याय हो सके। दूसरी माँग के रूप में उन्होंने मंडल डैम विस्थापितों को किसी ऐसे उपयुक्त स्थान पर बसाने का आग्रह किया जहाँ दोनों पक्षों के संवैधानिक और कानूनी अधिकार सुरक्षित रह सकें। अब देखना यह होगा कि गढ़वा, पलामू और लातेहार के लाखों लोगों की यह गूँज क्या शासन के कानों तक पहुँचती है या फिर यह न्याय की पुकार सिस्टम के शोर में एक बार फिर दबकर रह जाएगी।
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