झारखंड सरकार ने एक बार फिर 'अपरिहार्य कारणों' का सहारा लेते हुए राज्य में चल रही दो महत्वपूर्ण नियुक्ति प्रक्रियाओं पर तत्काल प्रभाव से रोक लगा दी है। सरकार के इस अचानक लिए गए फैसले से न केवल प्रशासनिक हलकों में हलचल मच गई है, बल्कि उन हजारों अभ्यर्थियों में भी निराशा फैल गई है जो लंबे समय से इन नियुक्तियों का इंतजार कर रहे थे। गौरतलब है कि मुख्य सचिव अविनाश कुमार और कार्मिक सचिव प्रवीण टोप्पो ने पूर्व में हाईकोर्ट को यह भरोसा दिलाया था कि चार सप्ताह के भीतर राज्य सूचना आयोग को क्रियाशील कर दिया जाएगा, लेकिन इस नए आदेश ने उन वादों पर सवालिया निशान लगा दिए हैं।
पहली बड़ी रुकावट लोकायुक्त और सूचना आयुक्तों की नियुक्ति प्रक्रिया में आई है। इनके चयन के लिए बुलाई गई महत्वपूर्ण बैठक को निर्धारित तिथि से महज एक दिन पहले स्थगित कर दिया गया। झारखंड में सूचना आयुक्त के पद साल 2020 से और लोकायुक्त का पद 2021 से खाली पड़ा है। नियुक्ति के लिए मुख्यमंत्री की अध्यक्षता में चयन समिति का गठन किया गया था, जिसमें नेता प्रतिपक्ष और नामित मंत्री शामिल थे, परंतु बैठक के अचानक टलने से इन संवैधानिक संस्थाओं के भविष्य पर संशय के बादल मंडराने लगे हैं।
दूसरी ओर, तकनीकी शिक्षा के क्षेत्र में भी सरकार ने बड़ा झटका दिया है। राज्य के राजकीय पॉलिटेक्निक और महिला पॉलिटेक्निक संस्थानों में 355 लेक्चरर के पदों पर चल रही नियुक्ति प्रक्रिया को आवेदन प्रक्रिया के अंतिम चरण में ही रोक दिया गया। झारखंड लोक सेवा आयोग (जेपीएससी) द्वारा निकाली गई इस भर्ती के लिए ऑनलाइन आवेदन की अंतिम तिथि 12 मार्च थी, लेकिन ठीक उसी दिन उच्च एवं तकनीकी शिक्षा विभाग ने पत्र भेजकर प्रक्रिया को अगले आदेश तक स्थगित करने का निर्देश दे दिया।
राज्य में पिछले छह महीनों के आंकड़ों पर गौर करें तो स्थिति और भी चिंताजनक नजर आती है। जेपीएससी और जेएसएससी के माध्यम से सिविल सेवा, ड्रग इंस्पेक्टर और जेल स्टाफ सहित 8,000 से अधिक पदों पर वैकेंसी तो निकाली गई, लेकिन इनमें से एक भी नियुक्ति प्रक्रिया अब तक पूरी नहीं हो पाई है। एक तरफ जहां सरकार 2,400 असिस्टेंट प्रोफेसरों की जल्द बहाली का दावा कर रही है, वहीं दूसरी ओर चल रही प्रक्रियाओं पर रोक लगने से युवाओं में भारी आक्रोश और अनिश्चितता का माहौल बना हुआ है।
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