भाषाई बहिष्कार: पहचान पर प्रहार या प्रशासनिक विवशता?
सरकार का यह निर्णय सीधे तौर पर 'समावेशी विकास' के नारे के विपरीत खड़ा दिखता है। किसी भी भाषा को क्षेत्रीय सूची से बाहर करने का अर्थ है उस भाषा को बोलने वाले युवाओं के लिए सरकारी नौकरियों और स्थानीय अवसरों के द्वार बंद कर देना।
लोकतांत्रिक अन्याय: भोजपुरी, मगही और अंगिका झारखंड के पलामू, गढ़वा, लातेहार और संथाल परगना के कई हिस्सों की मूल पहचान हैं। इन्हें बाहर रखना इन क्षेत्रों के नागरिकों को द्वितीय श्रेणी का नागरिक बनाने जैसा है।
संस्कृति का दमन: भाषा केवल संवाद का साधन नहीं, बल्कि विरासत होती है। जब सरकार राजकीय स्तर पर किसी भाषा को मान्यता देने से इनकार करती है, तो वह परोक्ष रूप से उस संस्कृति के भविष्य को असुरक्षित कर देती है।
शिक्षण में बाधा: JTET नियमावली में सुधार न करना और इन भाषाओं को स्थान न देना यह दर्शाता है कि सरकार इन क्षेत्रों के बच्चों को उनकी मातृभाषा में प्राथमिक शिक्षा और रोजगार के अधिकार से वंचित रखना चाहती है।
पलामू के दिग्गजों की चुप्पी: जवाबदेही के घेरे में नेता
पलामू प्रमंडल, जो भोजपुरी और मगही का मुख्य केंद्र है, वहाँ के दिग्गज नेताओं की इस मुद्दे पर विफलता उनके राजनीतिक वजूद पर सवाल खड़ा करती है। विशेषकर आलोक चौरसिया (भाजपा) और के.एन. त्रिपाठी (कांग्रेस) जैसे नेताओं की भूमिका अब जनता की अदालत में है।
आलोक चौरसिया (डालटनगंज विधायक): विपक्ष की भूमिका पर सवाल
भाजपा के कद्दावर नेता होने के नाते आलोक चौरसिया पर यह जिम्मेदारी थी कि वे सदन से लेकर सड़क तक इस 'भाषाई भेदभाव' के खिलाफ एक सशक्त आवाज बनें।
यदि पलामू की जनता की भाषा को राजकीय संरक्षण नहीं मिल रहा, तो विपक्ष के रूप में वे सरकार पर दबाव बनाने में क्यों विफल रहे? क्या उनका विरोध केवल बयानों तक सीमित है या वे वास्तव में अपनी जनता के भाषाई अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रहे हैं?
के.एन. त्रिपाठी (पूर्व मंत्री, कांग्रेस): सत्ता में रहकर भी बेअसर?
के.एन. त्रिपाठी राज्य की राजनीति में एक बड़ा चेहरा हैं और उनकी पार्टी (कांग्रेस) सरकार का हिस्सा है।
कैबिनेट में जब उनकी ही पार्टी की मंत्री दीपिका पांडे सिंह ने वकालत की, तो त्रिपाठी जी जैसे कद्दावर नेताओं का समर्थन जमीन पर क्यों नहीं दिखा? सत्ता के गलियारों में पहुँच होने के बावजूद अगर वे पलामू की जनता को उनका भाषाई हक नहीं दिला पा रहे, तो यह उनके नेतृत्व की 'पहुँच' पर गंभीर सवाल खड़ा करता है।
क्या यह 'वोट बैंक' की बलि है?
यह निर्णय केवल प्रशासनिक नहीं, बल्कि राजनीतिक ध्रुवीकरण की बू देता है। पलामू और संथाल परगना के लाखों लोगों के साथ यह एक प्रकार का 'सांस्कृतिक अत्याचार' है, जहाँ उनकी जुबान को कागजों पर अवैध घोषित करने की कोशिश की जा रही है।
क्या पलामू के ये नेता चुनाव के समय फिर उसी जनता से वोट मांगने जाएंगे, जिनकी भाषा को उन्होंने कैबिनेट की फाइलों में गुम होने दिया? यदि आज ये नेता अपनी जवाबदेही तय नहीं करते, तो भविष्य का झारखंड इन्हें भाषाई अस्मिता से समझौता करने वाले नेतृत्व के रूप में याद रखेगा।
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