पलामू जिले में इन दिनों प्रतिबंध के बावजूद नियमों की धज्जियां उड़ाते हुए 600 से अधिक अवैध 'बांग्ला ईंट भट्ठे' धड़ल्ले से चल रहे हैं। सरकारी प्रावधानों के अनुसार, इन भट्ठों को केवल निजी और घरेलू कार्यों के लिए ही अनुमति दी जाती है, लेकिन हकीकत में इनका बड़े पैमाने पर व्यावसायिक उपयोग किया जा रहा है। कानून की इस खुली अवहेलना से सरकार को दोहरी मार झेलनी पड़ रही है। एक ओर जहां खनन रॉयल्टी और करों की चोरी से सरकारी खजाने को भारी नुकसान हो रहा है, वहीं दूसरी ओर बिना किसी लाइसेंस और एनओसी के चल रहे ये भट्ठे क्षेत्र की पारिस्थितिकी को गंभीर नुकसान पहुँचा रहे हैं।
इन अनियंत्रित भट्ठों के कारण होने वाला पर्यावरणीय नुकसान अब चिंताजनक स्तर पर पहुँच गया है। चिमनी वाले भट्ठों के विपरीत, बांग्ला भट्ठों में धुएं को ऊपर छोड़ने की व्यवस्था नहीं होती, जिससे जहरीली कार्बन डाइऑक्साइड और हानिकारक कण निचली सतह पर ही जमा होकर हवा को जहरीला बना देते हैं। यह न केवल वायु प्रदूषण बढ़ा रहा है, बल्कि घनी आबादी के पास स्थित होने के कारण स्थानीय लोगों के स्वास्थ्य के लिए भी गंभीर खतरा पैदा कर रहा है। इसके अलावा, ईंट पकाने के लिए जंगलों से लकड़ियों की अवैध कटाई और नदियों से बालू का बेतहाशा उठाव प्राकृतिक संसाधनों का बेरहमी से दोहन कर रहा है।
इस पूरे संकट के पीछे प्रशासनिक शिथिलता और कथित संस्थागत भ्रष्टाचार की एक गहरी सांठगांठ नजर आती है। स्थानीय स्तर पर यह चर्चा आम है कि अंचल कार्यालय, खनन विभाग और पुलिस के कथित संरक्षण के कारण ही यह अवैध कारोबार फल-फूल रहा है। प्रशासन की गंभीरता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि जिम्मेदार विभाग एक-दूसरे पर जिम्मेदारी डाल रहे हैं। जिला खनन पदाधिकारी का कहना है कि कार्रवाई का अधिकार केवल पर्यावरण विभाग के पास है। जब तक पर्यावरण और श्रम कानूनों का सख्ती से पालन सुनिश्चित नहीं होता, तब तक मेदिनीनगर और आसपास के क्षेत्रों में प्रकृति और सार्वजनिक स्वास्थ्य पर यह खतरा मंडराता रहेगा।
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