पलामू जिले के हैदरनगर प्रखंड में हर घर तक नल से जल पहुँचाने का सपना दिखा रही जल जीवन मिशन योजना वर्तमान में खुद बदहाली का शिकार है। 56 करोड़ रुपये के भारी-भरकम बजट वाली इस महत्वाकांक्षी योजना का लक्ष्य क्षेत्र के 49 गांवों तक स्वच्छ पेयजल पहुँचाना था, लेकिन निर्धारित समय सीमा बीत जाने के बाद भी जमीनी स्तर पर काम मात्र 15 प्रतिशत पर अटका हुआ है। पाइपलाइन बिछाने और बुनियादी ढांचा तैयार करने का काम पिछले दो वर्षों से लगभग बंद पड़ा है, जिसके कारण स्थानीय ग्रामीणों को भीषण गर्मी के बीच पानी की भारी किल्लत का सामना करना पड़ रहा है।
भुगतान में देरी और विभागीय लापरवाही ने रोकी परियोजना की रफ्तार
इस बड़ी परियोजना के ठप होने का मुख्य कारण विभाग और संवेदक के बीच भुगतान का फंसा होना बताया जा रहा है। जानकारी के मुताबिक, कार्य शुरू करने के लिए संवेदक को करीब 5 करोड़ रुपये का अग्रिम भुगतान किया गया था, लेकिन इसके बाद विभाग की ओर से फंड जारी नहीं किया गया। नतीजा यह हुआ कि काम की गति धीरे-धीरे धीमी पड़ती गई और अंततः दो साल तक पूरी परियोजना पूरी तरह बंद रही। हालांकि, हाल के दिनों में पाइपलाइन बिछाने का काम फिर से शुरू होने की खबरें आई हैं, लेकिन काम की धीमी गति और विभाग की ढुलमुल कार्यशैली को देखते हुए ग्रामीण अब भी योजना के समय पर पूरा होने को लेकर संशय में हैं।
अधूरी पानी टंकियां और बदलती कार्ययोजना बनी बड़ी बाधा
सोन नदी (देहरी) से पानी लाकर कोडेरियाडीह, बहेरा, काशीनगर और पतपरिया जैसे दर्जनों गांवों में जलापूर्ति की जानी थी, जिसके लिए सात लाख लीटर क्षमता वाली पानी की टंकियां बनाई जानी थीं। वर्तमान में स्थिति यह है कि अधिकांश टंकियों का निर्माण अधूरा है और वे सफेद हाथी साबित हो रही हैं। इसके अलावा, ट्रीटमेंट प्लांट के स्थान में बार-बार बदलाव और स्थानीय स्तर पर भूमि विवादों ने भी आग में घी डालने का काम किया है। पहले यह प्लांट पुरता में प्रस्तावित था, जिसे बाद में देहरी शिफ्ट कर दिया गया, और कोडेरियाडीह में श्मशान भूमि पर टंकी निर्माण को लेकर हुए विवाद ने भी विकास की गति को पूरी तरह थाम दिया।
भीषण गर्मी में गहराया जल संकट, अधूरे वादों से ग्रामीण परेशान
जैसे-जैसे गर्मी का पारा चढ़ रहा है, पलामू के इन गांवों में पेयजल की समस्या विकराल रूप धारण करती जा रही है। जो योजना ग्रामीणों के लिए राहत की लहर लाने वाली थी, वह अब अधूरे पाइपों और सूखी टंकियों के रूप में विभाग की विफलता का प्रतीक बन गई है। पेयजल एवं स्वच्छता विभाग के अधिकारी स्वीकार करते हैं कि भुगतान न मिलने के कारण बिगुल कंस्ट्रक्शन द्वारा किया जा रहा कार्य रुक गया था। हालांकि अब कार्य दोबारा शुरू होने का दावा किया जा रहा है, लेकिन हकीकत यही है कि हजारों लोग आज भी अपनी प्यास बुझाने के लिए पारंपरिक और असुरक्षित जल स्रोतों पर निर्भर रहने को मजबूर हैं।
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