हजारीबाग: झारखंड का हजारीबाग शहर अपनी ऐतिहासिक और विश्वप्रसिद्ध रामनवमी के लिए जाना जाता है। यहाँ की रामनवमी केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि एक जीवंत सांस्कृतिक विरासत है, जिसकी गूंज विदेशों से लेकर भारतीय संसद तक सुनाई देती है। 100 साल से भी अधिक पुरानी इस परंपरा ने आज एक अंतरराष्ट्रीय पहचान बना ली है।
ऐतिहासिक जड़ें और शुरुआत
हजारीबाग में रामनवमी जुलूस की नींव वर्ष 1918 में रखी गई थी। इसकी शुरुआत का श्रेय गुरु सहाय ठाकुर को जाता है, जिन्होंने पहली बार अपने पाँच साथियों के साथ मिलकर जुलूस निकाला था। समय के साथ यह छोटा सा आयोजन एक विशाल जनसमूह के रूप में परिवर्तित हो गया।
1947 में भारत की आज़ादी के साथ इस जुलूस ने एक नया रूप लिया, जब इसे 'विजय उत्सव' के रूप में भी मनाया जाने लगा। बाद के वर्षों में, आयोजन को व्यवस्थित करने के लिए 1960 में 'महासमिति' का गठन किया गया।
आयोजन की मुख्य विशेषताएं
हजारीबाग की रामनवमी अपने अनुशासन और भव्यता के लिए जानी जाती है। इसकी कुछ मुख्य विशेषताएं निम्नलिखित हैं:
* लंबा रूट: यह जुलूस लगभग 10 किलोमीटर लंबे निर्धारित मार्ग से होकर गुजरता है, जिसमें झंडा चौक, बड़ा अखाड़ा और जामा मस्जिद रोड जैसे प्रमुख स्थल शामिल हैं।
* अखाड़ों की भागीदारी: वर्तमान में लगभग 150 अखाड़े इस जुलूस में भाग लेते हैं, जिनमें से अकेले 100 अखाड़े हजारीबाग शहर के ही होते हैं।
* लाठी-डंडों का प्रदर्शन: युवाओं द्वारा पारंपरिक हथियारों, लाठी-डंडों और तलवारबाजी का हैरतअंगेज प्रदर्शन इस उत्सव की विशेष पहचान है।
* ताशा पार्टी: 1970 के दशक में पहली बार 'ताशा पार्टी' को जुलूस में शामिल किया गया, जिसने इसके उत्साह को कई गुना बढ़ा दिया।
अटूट आस्था और जनसैलाब
इस तीन दिवसीय आयोजन में लगभग 4 से 5 लाख श्रद्धालु शामिल होते हैं। सबसे खास बात यह है कि जुलूस लगातार 48 घंटे तक चलता है, जिससे पूरा शहर भक्तिमय माहौल में डूब जाता है। हालाँकि, इतिहास के कुछ मोड़ों पर सांप्रदायिक तनाव की घटनाएं भी सामने आई हैं, लेकिन प्रशासन और शांति समितियों के सहयोग से अब इसे सुरक्षित और सद्भावपूर्ण तरीके से संपन्न कराने के निरंतर प्रयास किए जाते हैं।
आज हजारीबाग की रामनवमी सामाजिक एकता और सांस्कृतिक गौरव का एक जीवंत उदाहरण बन चुकी है। यह उत्सव न केवल हिंदू आस्था का प्रतीक है, बल्कि हजारीबाग की पहचान का एक अभिन्न हिस्सा भी है।
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