मेदिनीनगर: आनंद मार्ग के संस्थापक प्रभात रंजन सरकार, जिन्हें अनुयायी प्यार से ‘श्री श्री आनंदमूर्ति जी’ कहते हैं, का 105वां जन्मदिवस शुक्रवार को मेदिनीनगर के नई मुहल्ला स्थित आनंद मार्ग जागृति में ‘आनंद पूर्णिमा उत्सव’ के रूप में अत्यंत धूमधाम से मनाया गया। वर्ष 1921 में बिहार के जमालपुर में जन्मे आध्यात्मिक गुरु के जन्मोत्सव पर पूरा परिसर भक्तिमय वातावरण में डूबा रहा। कार्यक्रम का शुभारंभ अहले सुबह भजन-कीर्तन और सामूहिक साधना के साथ हुआ, जिसमें जिले भर से आए सैकड़ों श्रद्धालुओं ने हिस्सा लेकर आत्मिक शांति का अनुभव किया। इस अवसर पर वरिष्ठ आनंदमार्गी बैद्यनाथ जी ने गुरु के जीवन दर्शन पर प्रकाश डालते हुए बताया कि उन्होंने मानव जाति के शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक उत्थान के लिए तांडव, कोशिकी नृत्य और साधना का वैज्ञानिक मार्ग प्रशस्त किया, जो आज वैश्विक स्तर पर समाज के सर्वांगीण विकास का आधार बना हुआ है।
आध्यात्मिक कार्यक्रमों की कड़ी में जागृति परिसर से एक भव्य शोभायात्रा निकाली गई, जिसने शहर के विभिन्न मार्गों जैसे स्टेशन रोड, चर्च रोड, कचहरी चौक और छ: मुहान का भ्रमण किया। शोभायात्रा के दौरान आनंदमार्गियों ने "मानव-मानव एक है, मानव का धर्म एक है" के गगनभेदी नारों के साथ प्रेम, शांति और वैश्विक एकता का संदेश प्रसारित किया। इस जुलूस में शामिल अनुयायियों का उत्साह देखते ही बनता था। उत्सव के दौरान आयोजित तांडव और कोशिकी नृत्य प्रतियोगिताओं ने उपस्थित जनसमूह का विशेष ध्यान खींचा। साथ ही, नई पीढ़ी को अध्यात्म और कला से जोड़ने के उद्देश्य से बच्चों के लिए पेंटिंग और क्विज जैसी रचनात्मक प्रतियोगिताएं भी संपन्न हुईं, जिनमें नन्हे प्रतिभागियों ने अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन किया।
भाषायी विविधता को सम्मान देते हुए इस पावन अवसर पर श्री श्री आनंदमूर्ति जी द्वारा प्रदत्त ‘आनंदवाणी’ का वाचन मगही, हिंदी, संस्कृत, अंग्रेजी, नागपुरी और मैथिली सहित कई भाषाओं में किया गया, जिसने समावेशी संस्कृति की जीवंत मिसाल पेश की। उत्सव के दौरान एक अत्यंत प्रेरणादायी संदेश में गुरु की कृपा के महत्व को रेखांकित किया गया, जिसमें कहा गया कि उनकी करुणा का एक अंश भी जीव की मानसिक ग्लानि को दूर करने में सक्षम है और इस कृपा को समझना ही वास्तविक साधना है। इस भव्य आध्यात्मिक समागम में भुक्ति प्रधान मधेश्वर जी सहित विश्वनाथ, लक्ष्मण, सरोज, अखिलेश, अरविंद और रेणु जैसे अनेक गणमान्य श्रद्धालुओं ने अपनी सक्रिय उपस्थिति दर्ज कराई। यह आयोजन न केवल एक धार्मिक उत्सव रहा, बल्कि मानवता के उत्थान और व्यक्तिगत आत्म-विकास के प्रति संकल्प को दोहराने का एक सशक्त माध्यम भी बना।
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