रांची: झारखंड की राजनीति और सामाजिक गलियारों में भाषा विवाद एक बार फिर गरमा गया है। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की अध्यक्षता में हाल ही में संपन्न हुई राज्य कैबिनेट की बैठक में कई महत्वपूर्ण प्रशासनिक निर्णय लिए गए हैं। इस बैठक की सबसे बड़ी सुर्खी क्षेत्रीय भाषाओं की सूची को लेकर लिया गया फैसला रही। सरकार ने स्पष्ट कर दिया है कि भोजपुरी, अंगिका और मगही को क्षेत्रीय भाषा की श्रेणी में शामिल नहीं किया जाएगा। लंबे समय से चल रही खींचतान के बाद कैबिनेट के इस रुख ने राज्य में एक नई बहस को जन्म दे दिया है।
बैठक के दौरान कुल 15 अहम प्रस्तावों को मंजूरी दी गई, लेकिन पूरी चर्चा का केंद्र भाषाई नीति ही बनी रही। कैबिनेट ने इन तीन भाषाओं को क्षेत्रीय सूची से बाहर रखने का निर्णय लेकर अपनी मंशा साफ कर दी है। उल्लेखनीय है कि पिछली कैबिनेट बैठकों के दौरान कांग्रेस मंत्री दीपिका पांडे सिंह और वित्त मंत्री राधा कृष्ण किशोर ने भोजपुरी और अंगिका को इस सूची में जगह देने की पुरजोर वकालत की थी। उस समय मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए निर्णय टाल दिया गया था, मगर इस बार सरकार ने इन भाषाओं को शामिल न करने का अंतिम फैसला सुना दिया है।
इस भाषाई निर्णय के अलावा सरकार ने शिक्षा क्षेत्र से जुड़े 'जेटेड' (JTET) नियमावली को भी अपनी घटनोत्तर स्वीकृति प्रदान कर दी है। सरकार ने स्पष्ट किया है कि पुरानी नियमावली में फिलहाल किसी भी प्रकार का संशोधन नहीं किया गया है। कैबिनेट के इन फैसलों के बाद राज्य के विभिन्न भाषा संगठनों और सामाजिक समूहों की प्रतिक्रियाएं आनी शुरू हो गई हैं। माना जा रहा है कि आने वाले दिनों में यह मुद्दा राजनीतिक रूप से और अधिक तूल पकड़ सकता है। फिलहाल राज्य सरकार ने अपनी मौजूदा भाषाई नीति को बरकरार रखते हुए अन्य प्रशासनिक कार्यों को गति देने का संकेत दिया है।
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