रांची के हस्तशिल्प मेले में पर्यावरण संरक्षण की अनूठी मिसाल: प्लास्टिक छोड़ साल के पत्तों को अपनाने की अपील


रांची: आधुनिकता के इस दौर में जहाँ हर तरफ पर्यावरण संरक्षण की चर्चाएँ होती हैं, वहीं धरातल पर इसे अपनाने वालों की संख्या आज भी काफी कम है। बचपन में हमें प्रकृति की रक्षा और वृक्षारोपण की सीख तो दी जाती है, लेकिन भागदौड़ भरी जिंदगी में हम अक्सर इन छोटे मगर प्रभावी कदमों को भूल जाते हैं। एक अनुमान के मुताबिक, लगभग 70 प्रतिशत लोग अपने जीवन में एक भी पौधा नहीं लगा पाते, जबकि अनजाने में प्लास्टिक और थर्माकोल जैसी हानिकारक सामग्रियों का उपयोग कर पर्यावरण को निरंतर नुकसान पहुँचाते रहते हैं। विशेषकर सामाजिक आयोजनों और सामूहिक भोज में बड़े पैमाने पर उपयोग होने वाले प्लास्टिक के बर्तन न केवल गलते नहीं हैं, बल्कि जल और जमीन दोनों को जहरीला बना रहे हैं, जिससे मानव स्वास्थ्य पर भी बुरा प्रभाव पड़ रहा है।

इसी गंभीर समस्या के समाधान और लोगों को जागरूक करने के उद्देश्य से रांची के मोराबादी मैदान में आयोजित हस्तशिल्प मेले में एक विशेष स्टॉल लगाया गया है। मेले में झूले के समीप स्थित इस स्टॉल पर पर्यावरण के अनुकूल विकल्प के रूप में 'साल के पत्तों' से बने पत्तल और दोना (पत्तल-कटोरी) को बढ़ावा दिया जा रहा है। यहाँ आने वाले आगंतुकों को पारंपरिक और प्राकृतिक उत्पादों के उपयोग के लिए प्रेरित किया जा रहा है ताकि वे आधुनिक प्रदूषणकारी सामग्रियों का त्याग कर सकें।

साल के पत्तों से बने ये उत्पाद पूरी तरह से जैविक हैं, जो उपयोग के बाद आसानी से मिट्टी में मिल जाते हैं और किसी भी प्रकार का प्रदूषण नहीं फैलाते। सबसे खास बात यह है कि इनकी कीमत बाजार में उपलब्ध प्लास्टिक या थर्माकोल की प्लेटों के लगभग बराबर ही है, जिससे यह आम जनता के लिए एक सुलभ और किफायती विकल्प साबित हो रहे हैं। स्टॉल संचालकों का मानना है कि यदि लोग अपनी शादियों, धार्मिक कार्यक्रमों और सामुदायिक भोज में इन पारंपरिक पत्तलों का उपयोग शुरू कर दें, तो प्लास्टिक कचरे में भारी कमी आएगी।

इस पहल का एक सकारात्मक पहलू ग्रामीण रोजगार भी है। साल के पत्तों से पत्तल-दोना बनाने का काम मुख्य रूप से ग्रामीण क्षेत्रों के लोगों द्वारा किया जाता है। इनके उपयोग से न केवल पर्यावरण बचेगा, बल्कि सीधे तौर पर ग्रामीण कारीगरों को रोजगार के नए अवसर भी मिलेंगे। मेले में आने वाले लोगों से अपील की जा रही है कि वे एक बार इस स्टॉल पर जरूर आएं और इन उत्पादों को अपनी जीवनशैली का हिस्सा बनाएं। वर्तमान में झारखंड के सभी जिलों में इन उत्पादों की डिलीवरी की सुविधा भी उपलब्ध कराई गई है ताकि पर्यावरण संरक्षण का यह संदेश घर-घर तक पहुँच सके। विशेषज्ञों का भी यही मानना है कि प्रकृति की रक्षा केवल बड़े अभियानों से नहीं, बल्कि ऐसे छोटे-छोटे व्यक्तिगत संकल्पों से ही संभव है।

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